Tuesday, 14 June 2016

मृगमरीचिका

मृगमरीचिका

रेगिस्तान की सांद्र उमस में
भटके पथिक सा मन
कभी यहाँ कभी वहां
लक्ष्य के पीछे भागता
हर क्षण प्रतिक्षण
सामने, बस एक कदम दूर
तत्क्षण ही अदृश्य
समय की गति सा
आगम और निगम …..
रेगिस्तान की झुलसती बारिश में
भीगता तड़पता मेरा मन
हर क्षण आतुर
जल के लिए
सामने है नज़र
सम्मुख आए तो मिली
मृगतृष्णा,
व्याकुल, विह्वल और कोमल
दौड़ता भागता मेरा मन …..
रेगिस्तान की तड़पती आंधियों में
मोर पपीहे सा चीखता मन
तड़प बस एक बूँद की
चाह झलक की
पुकार एक चाह की
शोले की दहक में
शबनम की चाह
जीवन की राह में
मृत्यु का आलिंगन
रेगिस्तान की सांद्र उमस में
दौडता भागता मेरा मन…..
मेरा मन