Wednesday, 15 June 2016

काश…

मुहब्बत में जलाकर आज भी रखे दिये हमने
कभी तू लौटकर देखे अँधेरा न मिले घर में॥
ख़ुशी मिलती है, तेरी शोहबतें हासिल नहीं मगर
तेरी यादों के हाथो सौंप दी ये ज़िन्दगी हमने ॥
छुपा के रखे है हमने सभी जज़्बात इस दिल के
की खातिर इस ज़माने के तुम्हे झूठा कहा हमने ॥
मेरे अल्फाज़ कमतर है तुम्हारे इश्क़ की खातिर
ज़ुबान को रोककर सबकुछ बताया रूह से हमने ॥
हमारी चाहतें बेड़ी नहीं है पैर की तेरे
तुम्ही से हारकर खुदको तुम्हे जीता है फिर हमने ॥
सुना है आप कहते हो लिखा क्या खूब नगमा है
हरफ को देने से पहले सहा है दर्द सब हमने ॥
वजह सोचा किये क्यों आपने छोड़ा हमें तन्हा
बसा रखा है जब तुमको नसीबो में मेरे रब ने ॥
मुहब्बत में जलाकर आज भी रखे दिये हमने
कभी तू लौटकर देखे अँधेरा न मिले घर में॥
——
१७ मई २०१६ को लिखित