Wednesday, 15 June 2016

तन्हा राहें और तुम

उन्ही राहों पर हम तन्हा चले हैं
कदम के निशाँ तेरे मेरे पड़े हैं ॥
वही रंग हैं और वही रूप भी है
मगर पेड़ नज़रें झुकाए खड़े है ॥
बुलाया हमें उस गहरी नदी ने
जिसके किनारे सूने बड़े है ॥
मुझे देखकर फिर रोने को आई
वो कश्ती के चप्पू टूटे पड़े है ॥
तेरे साथ की फिर महक ढूंढता है
चमन में वीराने बिखरे पड़े है ॥
तुम्हे पूछता था पीछे का पर्वत
जहाँ दिल हमारे बिखरे पड़े है ॥
अभी थोड़े लम्हे जो गुज़रे यहाँ से
हमें तन्हा पाकर सिसकने लगे हैं ॥
मेरी रूह भी अब यही पूछती है
मैं ज़िंदा हूँ क्यों जब तुमसे परे है ॥
कभी बैठो फुरसत से तभी सोचना ये
फ़िक्र क्यों तुम्हारी करने लगे है ॥
उन्ही राहों पर हम तन्हा चले हैं
कदम के निशाँ तेरे मेरे पड़े हैं ॥

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२० मई २०१६ को लिखित